आइकोडेक/अविक्ली (Icodec/Awiqli) ड्रग
पाठ्यक्रम: जीएस-2/स्वास्थ्य
चर्चा में क्यों ?
डेनमार्क की औषधि कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में अपनी साप्ताहिक इंसुलिन इंजेक्शन (icodec) को लॉन्च किया है, जिससे मधुमेह रोगियों के लिए रक्त शर्करा का नियंत्रण अधिक सरल एवं सुविधाजनक होगा।
इंसुलिन का ऐतिहासिक विकास
- वर्ष 1921 से पहले, टाइप-1 मधुमेह (T1D) लगभग हमेशा घातक रोग माना जाता था और इसका उपचार केवल अत्यधिक कैलोरी प्रतिबंध तथा उपवास तक सीमित था।
- प्रारंभिक इंसुलिन सूअर एवं गाय के अग्न्याशय (Pancreas) से प्राप्त किया जाता था।
- 1960 के दशक में इंसुलिन की संरचना का पता लगाया गया।
- 1970 के दशक में पुनर्संयोजित डीएनए (Recombinant DNA) प्रौद्योगिकी विकसित हुई, जिसके परिणामस्वरूप पुनर्संयोजित मानव इंसुलिन का उत्पादन संभव हुआ।
- आधुनिक इंसुलिन अनुरूप (Insulin Analogues) को इस प्रकार संशोधित किया गया है कि उनका अवशोषण बेहतर हो तथा उनका प्रभाव अधिक समय तक बना रहे।
इंसुलिन का कार्य:
टाइप-1 मधुमेह
- इस रोग में शरीर बहुत कम या बिल्कुल भी इंसुलिन नहीं बनाता, इसलिए रोगी को जीवनभर इंसुलिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है।
टाइप-2 मधुमेह
- प्रारंभ में अधिकांश रोगियों का उपचार मौखिक दवाओं से किया जा सकता है।
- किंतु रोग बढ़ने पर लगभग 25–30% रोगियों को अंततः इंसुलिन उपचार की आवश्यकता पड़ती है।
क्या आप जानते हैं ?
- भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग मधुमेह तथा 13.6 करोड़ लोग पूर्व-मधुमेह (Pre-diabetes) से प्रभावित हैं।
- अंततः टाइप-2 मधुमेह के लगभग 20–30% रोगियों को इंसुलिन की आवश्यकता होगी, अर्थात लगभग 2 करोड़ संभावित उपयोगकर्ता।
- वर्तमान में केवल लगभग 60 लाख भारतीय ही इंसुलिन का उपयोग कर रहे हैं, जिससे इसके कम उपयोग (Underutilisation) का संकेत मिलता है।
आइकोडेक/अविक्ली (Icodec/Awiqli) ड्रग
- इंसुलिन आइकोडेक एक आनुवंशिक रूप से अभिकल्पित इंसुलिन (engineered insulin)अनुरूप (संशोधित मानव इंसुलिन) है।
- इसे इस प्रकार विकसित किया गया है कि यह सामान्य इंसुलिन की तुलना में शरीर में अधिक समय तक सक्रिय रहता है।
- इससे प्रतिदिन इंजेक्शन लगाने के बजाय सप्ताह में केवल एक बार इंजेक्शन लगाने की आवश्यकता होती है।
- यह विश्व का पहला दीर्घकालिक प्रभाव वाला साप्ताहिक इंसुलिन इंजेक्शन है, जो प्रतिदिन लगने वाले इंजेक्शन की संख्या घटाकर सप्ताह में केवल एक कर देता है।
- इससे वर्षभर में इंजेक्शनों की संख्या 365 से घटकर केवल 52 रह जाती है।
- इसे “अविक्ली (Awiqli)” ब्रांड नाम से ₹261 प्रति सप्ताह की कीमत पर उपलब्ध कराया जाएगा।
लाभ
- दवा की खुराक की आवृत्ति कम होने से रोगियों द्वारा उपचार का पालन (Compliance) बेहतर होता है।
- यह दीर्घकालिक रक्त शर्करा नियंत्रण (HbA1c) में सुधार करता है।
- इससे रोगियों में समय पर इंसुलिन उपचार शुरू होने की संभावना बढ़ती है, जिससे हृदय, गुर्दे, तंत्रिकाओं एवं आँखों से संबंधित जटिलताओं का जोखिम कम हो सकता है।
- इसे GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाओं के साथ सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है, जिससे रक्त शर्करा नियंत्रण बेहतर होता है तथा इंसुलिन की आवश्यकता कम हो सकती है।
दुष्प्रभाव
- हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त शर्करा का अत्यधिक कम होना) इंसुलिन आइकोडेक का सबसे सामान्य दुष्प्रभाव है, जो लगभग 10 में से 1 रोगी को प्रभावित करता है।
- विशेषज्ञों के अनुसार इसका जोखिम प्रतिदिन लगाए जाने वाले सामान्य इंसुलिन इंजेक्शनों के समान ही है।
- जब इंसुलिन पहले से अधिक बढ़ी हुई रक्त शर्करा को कम करता है, तब हाइपोग्लाइसीमिया अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
- मधुमेह की कुछ मौखिक दवाएँ भी हाइपोग्लाइसीमिया उत्पन्न कर सकती हैं, किंतु जब रक्त शर्करा बहुत अधिक होती है, तब यह कम स्पष्ट दिखाई देता है।
स्रोत :IE
ऑपरेशन अमिस्ताद
पाठ्यक्रम: जीएस-2/अंतरराष्ट्रीय संबंध / जीएस-3/रक्षा
चर्चा में क्यों ?
ऑपरेशन अमिस्ताद भारतीय दल की नई दिल्ली वापसी के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया।
ऑपरेशन अमिस्ताद
- यह वेनेज़ुएला में आए विनाशकारी भूकंपों के बाद भारत द्वारा चलाया गया मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियान था।
- प्रमुख विशेषताएँ :भारतीय वायुसेना के दो C-17 ग्लोबमास्टर-III विमानों द्वारा भारतीय सेना की 60 पैरा फील्ड हॉस्पिटल इकाई के 41 सदस्यीय दल को वेनेज़ुएला भेजा गया।
दल में शामिल थे—
- शल्य चिकित्सक
- एनेस्थीसिया विशेषज्ञ
- अस्थि रोग विशेषज्ञ
- दंत चिकित्सक
- अन्य चिकित्सक
- पैरामेडिकल कर्मचारी
- सहायक कर्मी
अभियान में निम्नलिखित राहत सामग्री भी भेजी गई—
- दो भीष्म क्यूब (BHISHM Cubes) — तीव्र आपदा प्रतिक्रिया हेतु आधुनिक, मॉड्यूलर एवं पोर्टेबल मिनी अस्पताल।
- 6 टन आवश्यक दवाएँ एवं चिकित्सा उपकरण।
- 30 टन राहत सामग्री, जिनमें तंबू, सौर लैम्प, पोर्टेबल जल शुद्धिकरण यंत्र तथा जनरेटर शामिल थे।
भारत की मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) व्यवस्था
- भारत की HADR व्यवस्था एक मजबूत नीतिगत एवं संस्थागत ढाँचे पर आधारित है, जो कूटनीति, रक्षा, आपदा प्रबंधन तथा जनस्वास्थ्य के समन्वित दृष्टिकोण के माध्यम से देश एवं विदेश में मानवीय संकटों का समयबद्ध एवं प्रभावी समाधान सुनिश्चित करती है।
अंतरराष्ट्रीय HADR अभियानों का संचालन निम्नलिखित के अनुसार किया जाता है—
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर प्रधानमंत्री का 10-सूत्रीय एजेंडा
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की अंतरराष्ट्रीय HADR दिशानिर्देश (अक्टूबर 2024)
ये दिशानिर्देश निम्न सिद्धांतों पर आधारित हैं—
- संप्रभुता का सम्मान
- अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून एवं मानवाधिकारों का सम्मान
- पारदर्शिता
- जवाबदेही
- नैतिक आचरण
- ये UNDRR लैंगिक कार्य योजना (2024) के अनुरूप समावेशी मानवीय सहायता को भी बढ़ावा देते हैं।
इन दिशानिर्देशों में भारतीय सशस्त्र बलों को त्वरित प्रतिक्रिया सक्षम बनाने वाली प्रमुख संस्था के रूप में मान्यता दी गई है तथा उन्हें निम्न भूमिकाएँ सौंपी गई हैं—
- रणनीतिक वायु परिवहन
- रसद प्रबंधन
- चिकित्सा सहायता
- निकासी अभियान
- अभियांत्रिकी सहायता
- ड्रोन एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पूर्वानुमान जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय HADR/निकासी/राहत अभियान
- “वसुधैव कुटुम्बकम्” तथा SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा एवं विकास) के सिद्धांतों के आधार पर भारत हिंद महासागर क्षेत्र एवं उससे आगे एक विश्वसनीय प्रथम प्रत्युत्तरकर्ता (First Responder) के रूप में उभरा है।
- भारत सेना, नौसेना एवं वायुसेना के संयुक्त प्रयासों से विश्व समुदाय को मानवीय सहायता, आपदा राहत, निकासी, चिकित्सा सहायता एवं पुनर्निर्माण सहयोग प्रदान करता है।
- INS सुनयना को IOS SAGAR (2025) के रूप में भारतीय महासागर देशों के कर्मियों के साथ शामिल किया जाना क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा, सहयोग एवं क्षमता निर्माण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत के प्रमुख अभियान
- ऑपरेशन मैत्री (नेपाल, 2015): भूकंप के बाद त्वरित बचाव एवं राहत तथा पुनर्निर्माण के लिए 2 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता।
- ऑपरेशन देवी शक्ति (अफगानिस्तान, 2021): 669 लोगों की सुरक्षित निकासी तथा मानवीय सहायता।
- मिशन सागर (2020 से): कोविड-19 महामारी के दौरान 15 हिंद महासागर देशों को खाद्य सामग्री, चिकित्सीय ऑक्सीजन एवं राहत सामग्री उपलब्ध कराई।
- ऑपरेशन समुद्र सेतु (2020): समुद्री मार्ग से 3,992 भारतीय नागरिकों की स्वदेश वापसी।
- ऑपरेशन गंगा (यूक्रेन, 2022): संघर्ष के दौरान 18,000 से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी।
- ऑपरेशन दोस्त (तुर्किये एवं सीरिया, 2023): विनाशकारी भूकंप के बाद चिकित्सा दल, फील्ड अस्पताल, बचाव दल एवं 135 टन से अधिक राहत सामग्री भेजी गई।
- ऑपरेशन कावेरी (सूडान, 2023): गृहयुद्ध के दौरान भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी।
- ऑपरेशन ब्रह्मा (म्यांमार, 2025): भूकंप प्रभावित म्यांमार को लगभग 750 टन मानवीय सहायता तथा फील्ड अस्पताल उपलब्ध कराया।
स्रोत :Air
जोधपुर की मोजड़ी को भौगोलिक संकेत (GI) टैग
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- राजस्थान की प्रतिष्ठित हस्तनिर्मित पादुका परंपरा जोधपुर मोजड़ी को भौगोलिक संकेत टैग (GI tag) प्रदान किया गया है।
जोधपुर मोजड़ी का परिचय
- यह चमड़े से निर्मित एक पारंपरिक जूता है, जो अपनी उत्कृष्ट कारीगरी, बारीक कढ़ाई तथा कालातीत शैली के लिए प्रसिद्ध है।
- इसका निर्माण मुख्यतः जीनगर समुदाय द्वारा किया जाता है, जो परंपरागत रूप से घोड़ों की जीन (सैडल) बनाने का कार्य करता था।
- इस शिल्प का लगभग 200 वर्ष पुराना इतिहास है।
- प्रारंभ में इसे राजस्थान के राजघराने का संरक्षण प्राप्त था और समय के साथ यह जोधपुर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन गई।
- जोधपुरी मोजड़ी का घरेलू बाज़ार लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक का अनुमानित है, जबकि इसका निर्यात लगभग 10 करोड़ रुपये का है।
- GI टैग मिलने से इसके वैश्विक बाज़ार की संभावनाओं में और वृद्धि होने की अपेक्षा है।
- मोजड़ी पुरुषों एवं महिलाओं दोनों द्वारा पहनी जाती है और राजस्थान की गर्म जलवायु के अनुकूल होती है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—
- हवादार बनावट।
- लंबी दूरी तक आराम से चलने योग्य।
- मजबूत एवं लचीली।
- घर एवं मंदिर में आसानी से उतारी जा सकने वाली।
- इसे इस प्रकार बनाया जाता है कि पैर का ऊपरी, पार्श्व एवं पिछला भाग लगभग खुला रहता है।

हाल के अन्य GI टैग
1. चंदननगर का जोलभोरा संदेश एवं जनाई का मनोहरा(Janai’s Manohara) (पश्चिम बंगाल)
- जून 2026 में पश्चिम बंगाल को चार और उत्पादों के लिए GI टैग प्राप्त हुए, जिससे राज्य में GI टैग प्राप्त उत्पादों की कुल संख्या 21 हो गई।
इनमें शामिल हैं—
- चंदननगर का जोलभोरा संदेश
- जनाई का मनोहरा
- बलागढ़ की पारंपरिक लकड़ी की नावें
2. मांडू की खुरासानी इमली (मध्य प्रदेश)
- जून 2026 में मांडू के प्रसिद्ध बाओबाब वृक्षों के फल, जिन्हें स्थानीय रूप से खुरासानी इमली कहा जाता है, को GI टैग प्रदान किया गया।
- यह अपने विशिष्ट मीठे-खट्टे स्वाद तथा उच्च पोषण मूल्य के लिए प्रसिद्ध है।
3. झारखंड के उत्पाद
- भगैया रेशम
- कुचाई रेशम
- मुंडा आभूषण
- बाँस शिल्प
- इन सभी को हाल ही में GI मान्यता प्राप्त हुई।
- इससे पारंपरिक ज्ञान पर आधारित शिल्पों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
- मुंडा आभूषण अपनी विशिष्ट डिज़ाइन, पारंपरिक कारीगरी तथा सांस्कृतिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध हैं और मुंडा समुदाय की पहचान को प्रतिबिंबित करते हैं।
4. आंध्र प्रदेश की पोंडुरु खादी
- पोंडुरु खादी आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के पोंडुरु गाँव (स्थानीय नाम पट्नुलु) में निर्मित पारंपरिक हस्तनिर्मित सूती वस्त्र है।
इसका निर्माण उसी क्षेत्र में उगाई जाने वाली—
- हिल कॉटन
- पुनासा कॉटन
- रेड कॉटन से किया जाता है।
- इसकी सबसे विशिष्ट विशेषता वालुगा मछली के जबड़े की हड्डी का उपयोग कपास की सफाई के लिए करना है, जो विश्व में कहीं और नहीं पाया जाता।
स्रोत: IE
भारत की पहली हाइड्रोजन चालित ट्रेन
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- भारतीय रेल ने भारत की पहली हाइड्रोजन ईंधन चालित ट्रेन को अधिसूचित किया है, जिसे 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाए जाने की संभावना है।
भारत की पहली हाइड्रोजन चालित ट्रेन
- इस परियोजना के लिए हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलमार्ग को पायलट कॉरिडोर के रूप में चुना गया है।
- यह ट्रेन पूरी तरह भारत में डिज़ाइन एवं विकसित की गई है।
- इसे ब्रॉड गेज प्लेटफ़ॉर्म पर बनाया गया है।
- 10 डिब्बों वाली यह वर्तमान में विश्व की सबसे लंबी हाइड्रोजन चालित ट्रेन है।
- यह 1,200 किलोवाट हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रणोदन प्रणाली से संचालित होती है।
- इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किमी प्रति घंटा है।
- परियोजना के प्रमुख घटक:
- 1,600 हॉर्स पावर वाले दो डीज़ल पावर कारों को हाइड्रोजन ईंधन सेल चालित कोचों में परिवर्तित किया गया है।
- हरियाणा के जींद में हाइड्रोजन भंडारण एवं पुनः ईंधन भरने (Refuelling) की सुविधा स्थापित की गई है।
- रिसर्च डिज़ाइन एण्ड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) इस परियोजना के अभिकल्प, प्रमाणीकरण तथा परीक्षण के लिए उत्तरदायी है।
महत्व
- यह ट्रेन भारतीय रेल की “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” पहल का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत देशभर के विरासत एवं पर्वतीय रेलमार्गों पर 35 हाइड्रोजन चालित ट्रेनें चलाने की योजना है।
- यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, क्योंकि जर्मनी और चीन जैसे कुछ ही देशों ने हाइड्रोजन चालित ट्रेनों का सफल विकास किया है।
- यह पहल भारतीय रेल को 2030 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जक (Net Zero Carbon Emitter) बनने के लक्ष्य के और निकट ले जाती है।
हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रौद्योगिकी
- हाइड्रोजन ईंधन सेल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से विद्युत उत्पन्न करता है।
- इस प्रक्रिया का एकमात्र उप-उत्पाद जलवाष्प होता है।
- यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित रेल प्रणोदन प्रणालियों की तुलना में अधिक स्वच्छ एवं पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।
स्रोत: TOI
केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अवसंरचना
सन्दर्भ
- केन–बेतवा नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित अनेक गाँवों के निवासियों ने बेहतर मुआवज़े एवं पुनर्वास की माँग को लेकर अपना आंदोलन पुनः शुरू कर दिया है।
केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना
- वर्ष 2021 में जल शक्ति मंत्रालय, मध्य प्रदेश सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार के मध्य केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन हेतु समझौता ज्ञापन (MoA) पर हस्ताक्षर किए गए।

- परियोजना:
- केन नदी (जो यमुना की सहायक नदी है) से बेतवा नदी (जो भी यमुना की सहायक नदी है) में जल का स्थानांतरण किया जाएगा।
- केन–बेतवा लिंक नहर की कुल लंबाई 221 किमी होगी, जिसमें 2 किमी लंबी सुरंग भी शामिल है।
- यह परियोजना दो चरणों में पूरी की जाएगी।
- प्रथम चरण: दौधन बाँध परिसर तथा उससे संबंधित सहायक संरचनाओं का निर्माण।
- द्वितीय चरण: इसमें तीन घटक शामिल होंगे—
- लोअर ओर बाँध,
- बीना कॉम्प्लेक्स परियोजना,
- कोठा बैराज।
- यह परियोजना नदियों को जोड़ने की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan) के अंतर्गत संचालित की जा रही है।
लाभान्वित क्षेत्र:
- यह परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों में फैला हुआ है।
- यह परियोजना जल-संकट से प्रभावित इस क्षेत्र के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।
- पूर्ण होने की समय-सीमा: इसे 8 वर्षों में पूरा करने का प्रस्ताव है।
स्रोत: TH
एल नीनो हुआ अधिक प्रबल, 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली घटनाक्रमों में शामिल होने की संभावना
पाठ्यक्रम: जीएस-1/जलवायु विज्ञान
सन्दर्भ
- अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अनुसार, प्रशांत महासागर में वर्तमान एल नीनो आने वाले महीनों में और अधिक तीव्र हो सकता है तथा 1950 के बाद के सबसे बड़े एल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।
एलनीनो
- एल नीनो का स्पेनिश भाषा में अर्थ “छोटा बालक” है।
- यह एक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान समय-समय पर सामान्य से अधिक हो जाता है।
- एल नीनो के दौरान व्यापारिक पवनें (Trade Winds) कमजोर पड़ जाती हैं।
- परिणामस्वरूप गर्म जल पूर्व की ओर (अमेरिका के पश्चिमी तट की दिशा में) चला जाता है तथा अपेक्षाकृत ठंडा जल एशिया की ओर धकेला जाता है।

एलनीनो का मौसम पर प्रभाव:
- वैश्विक तापमान में वृद्धि: विश्वभर में औसत से अधिक तापमान की स्थिति बनती है।
- मानसून पर प्रभाव: भारत में सामान्यतः मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे वर्षा कम होती है और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- वनाग्नि का बढ़ता जोखिम: विशेषकर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका तथा अमेरिका के कुछ भागों में।
- चरम मौसमी घटनाएँ: अधिक तीव्र तूफान, हरिकेन और चक्रवातों की संभावना बढ़ जाती है।
NOAA का नवीनतम पूर्वानुमान
- अक्टूबर–दिसंबर के दौरान अत्यंत प्रबल एल नीनो बनने की 81% संभावना है, जो 1950 के बाद के सबसे बड़े एल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।
- अब तक के 60% एल नीनो वर्षों में भारत में सामान्य से कम अथवा अल्प वर्षा दर्ज की गई है।
- जबकि शेष 40% एल नीनो वर्षों में मानसून के दौरान सामान्य वर्षा हुई है।
स्रोत: IE
एशियाई सिंह
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (दिल्ली) में एशियाई सिंह के तीन शावकों का जन्म हुआ है।
- दिल्ली चिड़ियाघर का यह प्रजनन कार्यक्रम बाह्य-स्थल संरक्षण (Ex-situ Conservation) का हिस्सा है, जिसमें संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रजनन उनके प्राकृतिक आवास से बाहर किया जाता है।
एशियाई सिंह (Panthera leo persica)
- यह भारत में पाई जाने वाली पाँच बिग कैट प्रजातियों में से एक है।
शारीरिक विशेषताएँ
- एशियाई सिंह अफ्रीकी सिंहों की तुलना में कुछ छोटे होते हैं।
- नर सिंहों की अयाल अपेक्षाकृत कम विकसित होती है, जिससे उनके कान दिखाई देते हैं।
- इनके पेट के नीचे त्वचा की एक स्पष्ट लंबवत तह होती है, जो इन्हें अफ्रीकी सिंह से अलग पहचान देती है।
वितरण
भारत में यह केवल गुजरात राज्य में पाया जाता है, मुख्यतः—
- गिर राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य
- पनिया वन्यजीव अभयारण्य
- मितियाला वन्यजीव अभयारण्य
- बरदा वन्यजीव अभयारण्य
जनसंख्या
- 16वीं सिंह जनसंख्या गणना के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच एशियाई सिंहों की संख्या 674 से बढ़कर 891 हो गई, अर्थात 32% वृद्धि हुई।
संरक्षण स्थिति
- IUCN रेड लिस्ट: संकटग्रस्त (Endangered)
- CITES: परिशिष्ट-I
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I

स्रोत: IE
नदी डॉल्फ़िन, हिम तेंदुआ तथा अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण हेतु नई परियोजनाएँ
पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- राष्ट्रीय प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) की शासी निकाय ने नदी डॉल्फ़िन, हिम तेंदुआ, जंगली जल भैंसा और भारतीय गैंडा के संरक्षण हेतु चार नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है।
- साथ ही मणिपुर के संगाई (भौंह-सींग वाले हिरण) के संरक्षण को भी निरंतर समर्थन प्रदान किया जाएगा।
हिम तेंदुआ (Panthera uncia)
- शारीरिक विशेषताएँ: घने फर, मजबूत शरीर तथा लंबी पूँछ, जो संतुलन बनाए रखने और गर्मी प्रदान करने में सहायक होती है।

- आवास: एशिया के 12 देशों के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, भूटान, चीन, कज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान शामिल हैं।
- इसे “पहाड़ों का भूत” (Ghost of the Mountains) भी कहा जाता है क्योंकि यह बहुत कम दिखाई देता है।
- आईयूसीएन स्थिति: वल्नरेबल (Vulnerable)
जंगली जल भैंसा (Bubalus arnee)
- जंगली जल भैंसा, जिसे एशियाई भैंसा भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया का स्थानिक एक बड़ा गोवंशीय (Bovine) पशु है।
- विशेषताएँ: जंगली जल भैंसे की त्वचा राख-धूसर (Ash-gray) से काले रंग की होती है। इसके मध्यम लंबाई के, खुरदरे और विरल बाल पिछले भाग (Haunches) से लंबे एवं संकरे सिर की ओर अग्र दिशा में होते हैं।
- आवास: जंगली जल भैंसा भारत, नेपाल, भूटान, थाईलैंड और कंबोडिया में पाया जाता है।
भारत में यह निम्न स्थानों पर पाया जाता है—
- असम में काज़ीरंगा, मानस और डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान, लाओखोवा वन्यजीव अभयारण्य, बुरा चापोरी वन्यजीव अभयारण्य तथा असम के कुछ अन्य बिखरे हुए क्षेत्रों में।
- अरुणाचल प्रदेश में डी’एरिंग मेमोरियल वन्यजीव अभयारण्य।
- मेघालय में बालफकराम राष्ट्रीय उद्यान।
- छत्तीसगढ़ में इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान तथा उदंती वन्यजीव अभयारण्य।
- आईयूसीएन स्थिति: इंडेन्जर्ड (Endangered)

भारतीय गैंडा (एक-सींग वाला गैंडा / Greater One-Horned Rhino)
- गैंडे बड़े, शाकाहारी स्तनधारी होते हैं, जिनकी पहचान उनकी विशिष्ट सींगयुक्त थूथन (Horned Snout) से होती है।
आवास: यह मुख्यतः निम्न क्षेत्रों में पाया जाता है—
- असम का काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान,
- असम का मानस राष्ट्रीय उद्यान,
- असम का पोबितोरा आरक्षित वन (जहाँ विश्व में भारतीय गैंडों का सर्वाधिक घनत्व पाया जाता है),
- असम का ओरंग राष्ट्रीय उद्यान आदि।
- आईयूसीएन स्थिति: वल्नरेबल (Vulnerable)

नदी डॉल्फ़िन
- भारत मीठे पानी की डॉल्फ़िन की दो प्रजातियों का आवास है: गंगा डॉल्फ़िन (Platanista gangetica) तथा सिंधु डॉल्फ़िन (Platanista minor)
गंगा नदी डॉल्फ़िन (Platanista gangetica):
- विशेषताएँ: गंगा नदी डॉल्फ़िन मूलतः अंधी होती है तथा पराश्रव्य ध्वनि (Echolocation) तरंगें उत्सर्जित करके शिकार करती है, जो मछलियों तथा अन्य शिकार से टकराकर वापस लौटती हैं।
- वितरण: यह भारत, नेपाल तथा बांग्लादेश की गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में पाई जाती है। यह केवल मीठे पानी में ही जीवित रह सकती है।
- आईयूसीएन स्थिति: इंडेन्जर्ड(Endangered)
- राष्ट्रीय एवं राज्य प्रतीक: वर्ष 2009 में गंगा नदी डॉल्फ़िन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया तथा यह असम का राज्य जलीय जीव भी है।
सिंधु नदी डॉल्फ़िन (Platanista minor)
- विशेषताएँ: सिंधु नदी डॉल्फ़िन भी कार्यात्मक रूप से अंधी होती है तथा मार्ग खोजने और शिकार का पता लगाने के लिए प्रतिध्वनि निर्धारण (Echolocation) पर निर्भर रहती है। स्थानीय भाषाओं में इसे सामान्यतः भूलन (Bhulan) कहा जाता है।
- वितरण: सिंधु नदी डॉल्फ़िन पाकिस्तान की सिंधु नदी प्रणाली में पाई जाती है तथा इसकी एक छोटी आबादी भारत की ब्यास नदी में भी पाई जाती है।
- आईयूसीएन स्थिति: इंडेन्जर्ड(Endangered)
- राज्य प्रतीक: सिंधु नदी डॉल्फ़िन पंजाब का राज्य जलीय जीव है।
संगाई-हिरण (Brow-antlered Deer)
- संगाई (Sangai), जिसे मणिपुर का भौंह-सींग वाला हिरण भी कहा जाता है, हिरण की एक ऐसी प्रजाति है जो भारत के मणिपुर राज्य के केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान में ही विशेष रूप से पाई जाती है।

- यह मणिपुर का राजकीय पशु है तथा अपने दलदली आवास पर चलने की विशिष्ट एवं नाजुक चाल के कारण इसे प्रसिद्ध रूप से “नृत्य करता हुआ हिरण (Dancing Deer)” कहा जाता है।
स्रोत: TH,